शुक्रवार, 18 अप्रैल 2008

आईपीएल का वेब-साईट

आईपीएल के तरकश का एक और तीर, बीसीसीआई ने लाईव-मीडीया (कनाडा) को आईपीएल के वेब-साइट के अधीकार २०० कङोङ रुपये मे बेचा है । लाईव-मीडीया को १० साल का अनुबंध मिला है । लगता है कि बीसीसीआई के पैसा कमाने के अनेक तरीको में से यह एक है । काश आईपीएल से कमाये पैसों का उपयोग बीसीसीआई क्रिकेट को आगे बढाने में भी करेगी ।

आईपीएल : क्या क्रिकेट की परिभाषा बदल पायेगी ?

आज आईपीएल का प्रारंभ हो रहा है, और क्रिकेट प्रेमी इस को लेकर बहुत उत्सुक हैं वैसे तो २०-२० का प्रारंभ तो काफी पहले हो गया था, आईसील ने क्रिकेट के इस रुप से भारतीयो को अवगत कराया , लेकिन इतने बङे पैमाने पर इस खेल को लाने का काम आईपील कर रही है प्रारंभ से ही आईपील नये किर्तीमान बनाते रही है, चाहे टीम की नीलामी हो या फिर खिलाङीयों की
आईपीएल अपने साथ बङे-बङे नाम को जोङने में कामयाब रही हैं इससे क्रिकेट प्रेमीयों की आशाएँ बढ गई है अब जब आज आईपीएल की शुरुआत हो रही है , लोगों की निगाहें इस पर टीकी है पैसों के मामले मे आईपीएल आगे जरुर है , पर क्या आईपीएल क्रिकेट २०-२० के स्तर को उठा पायेगा क्या ये क्रिकेट मे कुछ नये सितारें उभार पायेंगे ? खिलाङी खेल के स्तर को अंतरराष्ट्रीय दर्जे का बना पायेंगे ? क्या खिलाङी जो आज तक एक साथ खेलते रहे थे , अब एक दुसरे के विरुद्ध खेल पायेंगे ? यह सब तो समय ही बता पायेगा ।
बीसीसीआई ने पैसे तो खुब कमा लिये , अब बारी है क्रिकेट प्रेमीयो के आशाओं पर खरा उतरने की दर्शक आईपीएल से तभी जुङे रह पायेंगे अगर खेल मजेदार होगा और टीमों के बीच अच्छी प्रतीद्वंदीता रहेगी अब बस इंतजार है आज शाम का

मंगलवार, 15 अप्रैल 2008

काँग्रेसी नेताओं की चापलूसी

ऐसा लगता है कि राजनीति में हद की परिभाषा बदलने का ठेका मानों काँग्रेसी नेताओं ने ले लिया है । आये दिन कुछ नये कारनामों से चर्चा में रहने की जद्दोजहद मे आजकल काँग्रेसी लगे हैं । अर्जुन सिंह का बयान इसी कङी का एक हिस्सा है । इससे साफ झलकता है कि काँग्रेस में अग्रगणी नेताओं की कमी तो है हि , साथ-साथ पुराने नेता भी ढपोर-शंखी हो गये हैं । अब खबर मे बने रहने और आलाकमान के स्नेह-पात्र बने रहने के लिए ये नेता किस कदर व्याकुल रहते है ।
राहुल बाबा तो अभी राजनीति की तीपहीया पकङ कर ठीक से खङे भी नहीं हो पा रहे है , और ऐसे नेता जो अपनी राजनैतिक जीवन की अंतिम पारी खेल रहे है , उनको इस देश का बागडोर थामने की बात करते हैं । इनको पता है कि अगर गद्दी पर रहना है तो बिना ऐसी चापलूसी के संभव नहीं । ये सब एक दो दिन मे तो नही सीखा गया है , बर्षों की पाद-प्रछालन के बाद ही इन नेताओं ने यह गुङ सिखा है ।
यह तो मात्र एक शुरुआत है, आने वाले चुनाव की । अब हर छोटे-बङे नेताओं मे एसी होङ सी लग जाएगी । जनता की किसे खबर है ? महंगाई से चाहे जनता मर जाये इनके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगने वाली है ।

मंगलवार, 1 अप्रैल 2008

मुर्ख-दिवस का सच

क्या आप जानते हैं कि "मुर्ख-दिवस" क्यों , और कब से मनाया जाता है ? शायद आप जानते हो , या हो सकता है कि आपको सच्चाई पता ना हो । अगर आपका दिल भारी हो तो कृप्या कर आगे पढें ---
"मुर्ख-दिवस" को मनाने कि बात सदीयों पुरानी हैं , इस का विवरण महामुनी गंधर्व व्यास लिखित दुर्लभ ग्रंथ में भी मिलता है । (नाम लिखने के लिये जगह नहीं है )। तब इस दुनिया मे दो राज्य हीं थे । एक राज्य का नाम "इंद्रप्रस्थ" और दुसरे का "हस्तिनापुर" । इंद्रप्रस्थ के चक्रवर्ती राजा "दू-योजन" और "हस्तिनापुर" के निकटवर्ती राजा "सु-योजन" । वास्तव में दोनो के बीच एक गहरा और चौङा रीसता था , जो दोनो को एक दुसरे से अटूट बंधन में जोङ कर शदीयों से रखे था । "सू" का नाम "दू" के राज्य में लेने पर फाँसी और और "दू" के राज्य मे "सू" का नाम लेने वाले को आजीवन कारवास । झगङे कि जङ हमेशा कि तरह एक नारी "परी-योजना" । दू और सू के झगङे मे दोनों राज्य के लोग परेशान । आये दिन दोनों राज्यों के बीच महा-संग्राम हुआ करते थे । कभी "सू" कि सेना "दू" के राज्य पे सरे आलु की बरसात करवाती तो कभी "दू" की सेना "सू" के राज्य पे सरे टमाटर की । दोनों राज्य की जनता परेशान रहते । खाने को अनाज और सब्जीयाँ नहीं बचती और उपर से महा-संग्राम के बाद की बदबू, जिसको साफ करते करते छः महीने गुजर जाते और फिर अगला महा-संग्राम । इस सङे हुए संग्राम से खींझ कर "परी-योजना" ने एक बुढे बैल से शादी कर ली और सू ओर दू के दिल पर पहाङ टुट पङा । सू और दु के टुटे हुए दिल, साँसों का बोझ नहीं उठा पाए और लुठक कर दोनो राज्यो के बीच के रीसते को भर गये ।
रीसते भरते ही दोनों राज्य कि जनता आपस मे मिल कर रहने लगे , आखिर अकेले आलु और टमाटर की भी कोई सब्जी कब तक खाता । तब से ये दिन "सूदू-रयोजना" दिवस के रुप मे लोग मनाते हैं । जिसे अंग्रेजो ने नाम बदल कर "मुर्ख-दिवस" बना दिया जिसे लोग "अप्रैल-फूल" भी कहते है ।

पूर्ण-विराम