सभी आगंतुकों को मेरी होली की ढेर सारी शुभकामनाएँ । होली के कुछ गीतों का आनन्द उठाएँ । होली के अवसर पर कुछ पंक्तियाँ ।
होली आई रे, होली आई रे ।
डुबें हैं सब रंग-अबीर में,
सब हैं रंगे प्यार के रंग में ।
मस्ती का त्योहार है आया
सबने है हुङदंग मचाया ।
उठ रहा है रंगों का उबार
सब तरफ मची है रंगों की बौछार।
आओ रंगे प्यार से सब को
बचे ना कोई जाना-अनजाना,
आओ खेलें हिल-मिल के होली
होली आई रे, होली आई रे ।
बुधवार, 19 मार्च 2008
होली है - रंग और गुलालों की होली की शुभकामनाएँ
सोमवार, 17 मार्च 2008
एक माँ ऐसी भी
आज फिर से भ्रूण-हत्या संबंधी एक खबर आई है कि " दिल्ली में एक डॉक्टर ने अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया क्यों कि उसकी पत्नी ने जुङवाँ लङकी को जन्म दिया " । दोनों दम्पति डॉक्टर है और सास ससुर भी पढे-लिखे हैं । बहु के माँ बनने की खबर पा कर सास ने जबरदस्ती लिंग जाँच करवाया और जब पता चला की दो लङकीयाँ है , तो पहले पेट मे ही एक को मारने के लिय बात हुई । लेकिन पत्नी तैयार नहीं हुई और दोनो को जन्म दिया , और उसके बाद सबने मिलकर बहु को घर से निकाल दिया ।
यह समाचार पढ कर तो मन मे आक्रोश का उफान भरने लगा । मैने सुना है कि एक माँ ही माँ का दर्द समझ सकती है , तो फिर एक सास अपनी बहु का मन क्यो नही समझ सकती । फिर मन में उस माँ के लिय आदर और सम्मान का भाव उभरा जिसने इन सबके बावजूद बच्चीयों को जन्म दिया । ऐसी माँ तू धन्य है ।
गुरुवार, 13 मार्च 2008
राहुल गाँधी और भारत की खोज - राजनैतिक जरुरत या देश प्रेम
आजकल काँग्रेसी नेताओं में सरगर्मी आ गयी है ? इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं । चुनाव की बू सबसे पहले काँग्रेसी नेताओं से ही फैलती है , कम-से-कम ६० सालों तक देश पर राज कर इनता तो सीख ही गए हैं । और अब इस पाठशाला मे एक और कथीत युवा नेता ने नाम लिखाया है, " राहुल गाँधी " । इसी पाठशाला से राहुलजी सीखें हैं कि चार साल तक चाहे लाखों किसान आत्महत्या कर ले, कोई भारत भ्रमण कि जरुरत नहीं, बस जैसे ही चुनावी बिगुल बजे निकल पङो पद-यात्रा के बहाने राजनैतिक रोटी सेकने।
राहुलजी पिछले कुछ हफ्तों से भारत खोज पर निकलें हैं । शायद पिछले चार सालों में भारत किताबों में खोज रहे थे , और जब कुछ हाथ नही लगा तो निकल पङे , जंगल-झाङ में भारत खोजने । अगर दो-तीन साल पहले शुरु करते तो कुछ खोज पाते, मगर अब तो समय कम हैं और भोली-भाली जनता को अपना मुखङा दिखाने का इससे अच्छा समय नहीं । चुनाव में कम समय हैं और इतनी जल्दी लोग भुलेंगे भी नहीं , कम से कम उङीसा पुलिस तो नहीं भुलेगी जो पहले से नक्सलीयों से भीङी हुई है, और झेल रहे हैं बिन-बुलाये मेहमान को। अभी उङीसा की सरकार के नाक में दम कर रखा है , अगला शिकार मध्य-प्रदेश और फिर जाने कौन-कौन । रात की चुपचाप मुलाकात का तो सिर्फ एक ही मकसद हो सकता है मीडीया कवरेज । राहुलजी सोच रहे होंगे काश नकस्लीयों के हाथ लग जाता तो और अच्छा मीडीया कवरेज मिलता , दो तीन हफ्तों तक तो सुर्खीयों में रहता हीं ।
कभी अपनी पार्टी को बदले की माँग , तो कभी कोयला कंपनी का विरोध और अब एक नया सगुफा किसानों की ऋण माफी उत्पादकता पर हो। लगता है कोई ढोस मुद्दा हाथ नहीं लगा है । राहुलजी ६०,००० करोङ का दिखावा कम पङ गया था क्या ? जो अब नया राग अलाप रहे हैं , या फिर पता चल गया की लोग ६०,००० करोङ के झाँसे में नहीं आ रहे है । भगवान बचाये इन राजनीति के नौसिखियों से।
बुधवार, 12 मार्च 2008
कृषि ऋण माफी : एक मृग तृष्णा ?
२००८ के केंन्द्रीय बजट मे भारत सरकार के ६०,००० हजार करोङ के ऋण माफी की घोषणा के बाद, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पटल पर एक द्वन्द सा प्रारंभ हो गया है । लोगो के बीच इस बजट कि आलोचना और प्रसंशा कि होङ सी मच गई है । एक तरफ यह बजट कुछ लोगों के लिए खुशीयाँ ले कर आया है तो दुसरी तरफ, उदास और मायुस किसान जिनको सरकारी बैंको से लोन नही मिला और आखिर में साहुकारों के चंगुल में फसें । ऐसे किसानो की संख्या दो तीहाई से भी ज्यादा है । और साथ मे वो किसान , जो पाई-पाई जमा कर के बैंको का ऋण चुकाए, और अब पछता रहे हैं ।
सरकार ने ऋण माफी का एलान सिर्फ २ हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसानो के लिए की है, जिनके लिए ऋण मिलना ही बङी बात होती है । दलालों और बैंक के बाबुओं को चढावा के बिना एक रुपया का ऋण भी नहीं मिलता । बीजेपी की दलील माने तो ऐसे ऋण २३,००० करोङ से ज्यादा नही है, तो फिर इतना ढिंढोरा क्यों ? इसके साथ-साथ ये ऋण माफी किसानों तक कब पहुँचेगी इसका जिक्र वित्त-मंत्रीजी ने नहीं किया है, और ना ही ये बता रहे हैं कि बैंको को हो रहे घाटो से कैसे उबारेंगे । लगता है कि वी.पी.सिंह की सरकार से कोई सबक लेने को काँग्रेस की सरकार तैयार नहीं है, जब १०,००० करोङ के ऋण माफी के बाद कई सहकारी बैको का दिवालीया निकल गया था ।
अगर काँग्रेस की सरकार सही में किसानो का भला चाहती है तो, किसानो को उचित मुल्य पर खाद और बीज के प्रबंध , आनाज के समर्थन मुल्य, उन्नत खेती के तरीकों को किसान तक पहुचाने पर विचार करना चाहिए, ना की ऐसे चुनावी ढकोसलों पर ध्यान देना चाहिए ।
सोमवार, 10 मार्च 2008
हॉकी का अंत ?
ब्रिटेन ने भारत को 0-2 से हॉकी क्वालिफाइंग मैच मे हरा कर, ओलंपिक के सपने को ध्वस्त कर दिया । वैसे भी क्रिकेट के बढते प्रभाव से , हॉकी पिछङ रहा है , और उपर से ये हार । भारतीय खेल-प्रेमीयों के लिये ये एक बङे सदमे से कम नहीं ।
भारतीय हॉकि संघ को इस पर गंभीर आत्म-मंथन करने कि जरुरत है । हॉकी कोच का इस्तीफा तो शायद इस समस्या कि एक झलक मात्र है । टीम की आंतरीक कलहों का समाचार तो हमें आये दिन मिलता रहता है । इन सब से खिलाङीयों का मनोबल तो गीरता है, उनके खेल पर भी असर पङता है ।
अब जरुरत है कि सभी पक्षों को साथ में बैठ कर इस पर विचार करना पङेगा । हॉकी के गौरवशाली इतिहास को बचाए रखने के लिये , एक सम्यक प्रयास ही कारगर साबित हो सकता है ।
बुधवार, 27 फ़रवरी 2008
क्रिकेट अब सभ्यों का खेल नहीं रहा
क्रिकेट-जगत में इन दिनों जो कुछ भी चल रहा है , उससे तो बस एक ही बात मन मे आती है कि "क्रिकेट अब सभ्यों का खेल नहीं रहा " । भारत - ऑस्ट्रेलिया सीरीज ने तो इस पर मुहर लगा दी है । हर दूसरे खेल के दौरान कोई-ना-कोई विवाद उठ खङा होता है । इस सीरीज में ऑस्ट्रेलिया के खिलाङीयो का व्यवहार निम्न अस्तर का, पुरा क्रिकेट समुदाय थु-थु कर रहा है , लेकिन इन मद-मस्तों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती ।
यह विवाद क्रिकेट के मुल पहचान को बदल रहा है । अब हर टीम मे स्लोजींग एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है । इसे इर्जाद करने वाले ऑस्ट्रेलियन को, यह पैतरा उलटा पङ रहा है । इन सब के बीच भारतीय युवा खिलाङीयो को थोङा सतर्क रहने कि जरुरत है । खेलना मुख्य उद्देश्य रहना चाहीए ।
शनिवार, 26 जनवरी 2008
लाख और खाक
छोटे निवेशको का भी बुरा हाल रहा । इन सब से तो एक ही सीख मिलती है कि बिने सोचे समझे सटॉक बाजार में पैसा लगाना सट्टे बाजी से कम नहीं ।
और आज बाजार एक कीर्तिमान बनाते हुए, एक दिन मे 1000 से ज्यादे कि उछाल के साथ जब बंद हुआ , तो मानो लगा ही नही कि दो दिन पहले ही बाजार मे मातम का माहौल था । निवेशको का विश्वास लौटने मे कुछ समय तो जरुर लगेगा । भारत की आर्थिक-स्थिति , जानकारों के नजर मे इस साल अच्छी रहने कि संभावना है , इस कारण बाजार में इस साल भी हलचल बनी रहेगी ।
शुक्रवार, 25 जनवरी 2008
भारतरत्न की राजनीति
ये प्रश्न सबके मन मे हैं कि अगला भारतरत्न किसे मिलना चाहीए, लकिन इसमे दो राय नही की ये आजकल के राजनीतिको पे नहीं छोङा जा सकता ।
बुधवार, 9 जनवरी 2008
भारत की सिडनी जीत
आखिरकार आईसीसी को सच्चाई के सामने झुकना ही पङा । शायद इसे कुछ लोग इसे घनी बीसीसीआई के सामने आईसीसी का नतमस्तक होना कहे या फिर दो देशों के बीच एक बङा विवाद पर पुर्ण-विराम लगाने कि कोशीश कहे । मेरा यह मानना है कि आज क्रिकेट और भारत की वर्षों पुरानी रंग भेद के संघर्ष की फिर जीत हुई है ।
खेल को युद्घ मे बदलने की रिकी पौन्टींग कि कोशिश को एक करारा जवाब मिला है । आज औस्ट्रेलिया के लोग हि रिकी पौन्टींग के दुर्योघन-नीति को अस्वीकार कर दिया है । खेल अगर खेल कि भावना से ना खेला जाए , इसका नजारा तो सारी दुनिया ने सिडनी टेस्ट मे देखा है । और अब रिकी पौन्टींग को शायद ये समझ आ जाए कि क्रिकेट प्रेमीयों ने चाहे औस्ट्रेलियाई हो या भारतीय , सिर्फ एक सभ्य तरीके का खेल देखना चाहती है ।

